कुछ कम रोशनी में वो परछाईं सताती है,मैने घर में अंधेरा कर लिया।
ना कोई आ सके, ना मै जा सकूँ, मैने किवाङ बंद कर लिया।
ना धरती आकाश से मिली कभी, ना पाषाण पानी में घुला, खुद को समझा लिया।
मिला गर सूरज भी चन्द्रमा से ग्रहण उसे लगा गया।
रोशनी से अब मुहब्बत ना रही. धूप छाँव का खेल मुझे डराने लगा।
अपने हिस्से का उजाला भी औरों के नाम कर खुद को गुमनाम कर लिया।
अपर्णा
No comments:
Post a Comment