चहकना था जिसे, आँगन की मुंडेर पे।
वो चूल्हे के धुएँ से झगड़ती मिली।।
फुदकना था जिसे के हाथ ना आये किसी के।
वो चार-दीवारी में कैद मिली।।
पायल की छम-छम सुन जिसे था ख़ुशी से नाचना।
वो पायल सी बेड़ियों में जकड़ी मिली।।
हरी चूड़ियों को देख जिसे था खिलखिलाना।
रंग-ओ-उमर का फ़र्क था बस के हथकड़ियाँ मिली।।
होना था जिसे स्कूली पोशाक में।
वो आज दुल्हन के लिबाज़ में मिली।।
------अपर्णा----