Thursday, February 21, 2013

गम

ऐ ग़म के बादल कहीं दूर चला जा।
मेरी आँखों को रेगिस्तां बना जा।
-----अपर्णा------

Monday, February 18, 2013

बचपन

चहकना  था जिसे, आँगन की मुंडेर पे।
वो चूल्हे के धुएँ से झगड़ती मिली।।

फुदकना था जिसे के हाथ ना आये किसी के।
वो चार-दीवारी में कैद मिली।।

पायल की छम-छम  सुन जिसे था  ख़ुशी से नाचना।
वो पायल सी बेड़ियों में जकड़ी मिली।।

हरी चूड़ियों को देख जिसे था खिलखिलाना।
रंग-ओ-उमर का फ़र्क था बस के हथकड़ियाँ मिली।।

होना था जिसे स्कूली पोशाक में।
वो आज दुल्हन के  लिबाज़ में मिली।।
------अपर्णा----

Friday, February 1, 2013

तुझसे बेहतर भी हैं लोग ज़माने में ।
इक बार आईने से नज़र हटा के तो देख।।
-----अपर्णा----