Saturday, November 17, 2012

एक गुजारिश।।
बड़ा शोर है आजकल ना रोको उसे इस दुनिया में आने से।
बक्श दो उस जान को, जो अनजान है इस ज़माने से।
बंद करो इस शोर को, सुन लो मेरी भी आवाज़ निकली आज दिल से।
क्यों रोकती है दुनिया, उस नन्ही सी जान को, यहाँ आने से।
हजारों वजहें हैं, रोक लो ग़र मुमकिन हो, एक भी वजह खुद से।
बनते हैं वजह हम भी कभी, आखिर हम भी आते हैं इसी जमाने से।
बचपन से जवानी तक अपने रहते हैं सुरक्षा में उसकी सिपाही से।
जिंदगी गुज़ार देते हैं  माता-पिता जुटाने में धन, खजांची से।
फिर भी रहते हैं खड़े लड़के वालों के आगे हाथ जोड़े, गुलामों से।
अँधियारा कर बाबुल का घर, रोशन किया पिया का घर अपनी चांदनी से।
उस रौशनी का रूप न भाये किसी को, उजाला चाहिए उन्हें घर क चिराग से।
ना दे पाई ग़र वो घर के चिराग को, कैसे बचा पाएगी वो खुद को तिरस्कार से।
ना बनेगी फिर से ये कहानी, रोक लो उसे इस संसार में आने से।
या बदल लो खुद को, ग़र पते हो खुद को मिलते जुलते किसी किरदार से।
बस यही गुजारिश है इस नन्ही सी जान की आप सबसे।
मुझे भी आना है इस संसार में भरना है अपना आँगन खुशियों से।
अपर्णा


Tuesday, November 6, 2012


अब ना है तुझे ग़मों को ढोने की जरुरत, ना बीते कल को तरसने की जरुरत।
संग लिए लाखों खुशियाँ आने वाला कल तुझसे मिलने को बढ़ता आ रहा है।
अपर्णा