Tuesday, June 25, 2013

केदारनाथ

इस तपती गर्मी में रोंगटे खड़े हो गए, जब देवभूमि को गिरते देखा।
मंदाकिनी को जटाओं में बसाने वाले महादेव को, उसमे ही बहते देखा।
मंदिर को शमशान में बदलते देखा, साधुओं को लुटेरे बनते देखा।
बड़ी बड़ी इमारतों को रेत के  घरोंदो सा मिटते देखा।
भीगे तन लिए कांपते लोगों को प्यास से तड़पते देखा,
अपनों के हाथों से हाथ छूटते  देखा, परिवारों को बिछड़ते देखा।
लाशों में कोई अपना न मिले, मन ही मन दुआ करते देखा।
इस तपती गर्मी में रोंगटे खड़े हो गए, जब देवभूमि को गिरते देखा।
अपर्णा।।


Saturday, June 15, 2013

यादें 3

गिरता हूँ, संभलता हूँ, हर कदम तेरी यादों में चलता हूँ।
मायूस होता हूँ कभी , कभी मुस्कुराता भी हूँ।
उदासीन सी ज़िन्दगी में तेरे ही रंग  भरता हूँ।
आसमानों में उड़ता हूँ कभी, समुन्दर की गहराइयों में डूबता भी हूँ।
खोकर तुझे असल में, ख्यालों में पाता भी हूँ।
तेरी ही यादों में कभी मरता हूँ, कभी जीता हूँ।।
अपर्णा।।

Saturday, June 1, 2013

खुदा

 खुदा को वक़्त के साथ आजमाना छोड़ दिया।
 सर तो झुकता है, हाथ फैलाना छोड़ दिया।।
 अपर्णा