आँखों को अधूरा ख़्वाब याद आये,
बारसात होना लाज़मी है.
अपर्णा
दर्द अपना आंसुओं की स्याही से कागजों को बता देना ऐ दिल.
औरों के कान जुबानों से चुगलियां लगा दिया करते हैं।
अपर्णा
वक्त आगे बढ़ता पल- पल,
तारीखें, घङी की सुईयों की तरह,
घूम कर फिर वहीं आकर बताती हैं,
तब कहाँ थे तुम, अब कहाँ हो,
अब तय करो के जाना किधर है,
मेरा तुम्हारा साथ ज्यादा नही,
थमना है तुम्हें एक दिन,
मै कब थमा हूँ किसी के लिए,
बेवफा कहो, या दर्द की दवा,
मुझे परवाह नही,
सफर में हूँ मै, मेरी कोई मंजिल नही।
अपर्णा
कुछ कम रोशनी में वो परछाईं सताती है,मैने घर में अंधेरा कर लिया।
ना कोई आ सके, ना मै जा सकूँ, मैने किवाङ बंद कर लिया।
ना धरती आकाश से मिली कभी, ना पाषाण पानी में घुला, खुद को समझा लिया।
मिला गर सूरज भी चन्द्रमा से ग्रहण उसे लगा गया।
रोशनी से अब मुहब्बत ना रही. धूप छाँव का खेल मुझे डराने लगा।
अपने हिस्से का उजाला भी औरों के नाम कर खुद को गुमनाम कर लिया।
अपर्णा
बीमार माँ को देखने विदेश से लायक बेटा दवाएँ और फल लाया,
और गरीब बेटा तीमार दारी में दिन रात लगा रहा।
अपर्णा
घर की सफाई करते- करते- करते,
रिश्तों के कुछ टुकङे मिले, जो प्यार से थे कभी जुङे हुए,
टुकड़ों को तो फेंक दिया, प्यार नही था बाकी अब।
और इक डिब्बे में, माँ की चूङियां मिली,
जो याद दिला गई खनकते थप्पङ की,
दुलार था जिसमें बाकी अब तक,
फिर रख दिया संभालकय, यही तो है उनकी निशानी अब।
अपर्णा
यूँ तो ठहरा सा है समुन्दर तेरी यादों का इन आँखों में,
डुबकी लगे जब भी, कुछ बूँदें साहिलों को भिगोकर चली जाती हैं।
अपर्णा
एहसास. .....
उमङते- घुमङते,
डूबते- तैरते,
गोते लगाते,
छितरे- बिखरे,
दबे- कुचले,
रंगीन- उदासीन,
समेटकर सारे,
चल पङे हैं हम,
और चलेंगे निरंतर,
अंतिम साँस तक,
तुम हो इन्ही एहसासों में,
और चलोगे साथ निरंतर,
अंतिम साँस तक।
अपर्णा