बरसों से जो नहीं खुला, खोलो दरवाजा, भरा वो ज़ख्म फिर उभर आएगा।
आईने पे जमी धूल हटाओ, यादों का मंज़र साफ़ नज़र आएगा।
उढाई जो सफ़ेद चादर हटाओ, टुटा वो ख्वाब नज़र आएगा।
अलमारी में रखा सामान उठाओ, सजा उसमे साथ नज़र आएगा .
दीवार पे टंगी तस्वीर उतारो, वो चेहरा अब भी प्यारा नज़र आएगा।
खैर छोड़ो, बंद ही रहने दो इस सूने कमरे को, वरना वो जख्म नासूर बन जायेगा।
वक़्त के मरहम से ये जख्म भी भर जायेगा।
वक़्त के मरहम से ये जख्म भी भर जायेगा।
फेंक दो चाभी कहीं दूर, दिल के घर को सजाओ, मुस्कुराओ, जीवन खुशनुमा हो जायेगा।।
अपर्णा 'निशु'
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