Monday, March 19, 2012

माँ,  तूने  ही, हर मुश्किल में जीना सिखाया!
हर गम को  मुस्कुराकर, सहना सिखाया!
मेरे पैरों को कहाँ थी चलने की आदत,
दो उँगलियों से चलना सिखाया!
छोड़कर हाथ मेरा, आगे बढ़ना सिखाया!
गिर कर हार ना जाऊं कहीं,
फिर से खड़ा होना सिखाया!
दुनिया की बुरी  को देख  ,
आँचल में छुपाकर सीने से लगाया!
दूर जाकर कोई क्या तोड़ेगा मुझे,
छोड़कर अकेला, तन्हा रहना सिखाया!    
अब किसी चोट से दर्द होता नहीं मुझे,
तेरे दर्द ने मुझे, इसमें जीना सिखाया!
तू साथ हो या हो दूर,
मुझमे तो तेरा हर पल है समाया ,
माँ,  तूने  ही, हर मुश्किल में जीना सिखाया!
हर गम को  मुस्कुराकर, सहना सिखाया!
अपर्णा 'निशु'!!!!!!!

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